परोपकारी जीवन एक देव तुल्य जीवन है जिसकी लोग हमेशा प्रशंसा करेंगे।
मनुष्य जैसे जैसे शिक्षित होता गया वैसे वैसे स्वार्थी होता गया कही ऐसा भी समय ना आ जाए की लोग परोपकार को सिर्फ कहानियों में ही पढ़ कर ही समझ सके की परोपकार क्या होता है।
किसी समय में महर्षि दधीचि जो अपने बाल्य काल से ही परोपकारी एवं साहसी थे। एक बार एक पेड़ पर एक जहरीला साँप चढ़ गया। उस पेड़ पर एक तोते का परिवार रहता था साँप ने तोते के नन्हे से बच्चे को पकड़ लिया और बच्चा बचने के लिए तड़फड़ाने लगा। अपने बच्चे की मृत्यु नजदीक देख तोता और तोती बिलखने लगे। पेड़ के निचे तमाशबीनो की भीड़ जुट गयी, लेकिन किसी ने तोते के बच्चे को बचाने की हिम्मत नहीं दिखाई।
वही पास में दधीचि खेल रहे थे शोर - गुल सुन कर वे वह पहुंचे वश्तुस्थिति समझते ही वे पेड़ पर चढ़ गए। निचे खड़े लोग चिल्लाने लगे ..... दधीचि........निचे उतर जाओ साँप तुम्हे डस लेगा। यह सुन कर दधीचि बोले .......जीवन की रक्षा करना मनुष्य का धर्म है। मै तोते के परिवार को विपत्ति में पड़ा देख उससे मुँह नहीं मोड़ सकता। उन्होंने लकड़ी मार - मारकर सॉप के मुँह से बच्चे को छुड़ा लिया अपने बच्चे को जीवित देख तोता और तोती चहचहा उठे।
इससे पहले क्रोधित साँप उनपर हमला करता उन्होंने पेड़ से छलांग लगा दी उन्हें काफी चोटे आयी। लोगो ने उनसे पूछा .........दधीचि तुम्हे साँप से डर नहीं लगा यह सुन कर दधीचि ने उत्तर दिया .......डरना कैसा ......डरना है तो गलत काम करने से डरो।
अच्छा काम करने वालो की रक्षा तो स्वयं भगवान् करता है। दधीचि की यह लोक रक्षा की भावना आगे इतनी सशक्त हो गई की उन्होंने अपने शरीर की हड्डिया तक असुरता के नाश हेतु दान दे डाली। आज भी महर्षि दधीचि अपने इन्ही भावों के कारण विश्वविख्यात है। शायद ही कोई होगा जो इनके बारे में न जानता हो। परोपकार करना सबसे बड़ा धर्म का काम है इसके जैसा इससे बढ़िया कोई कर्म नहीं है। परोपकारी जीवन एक देव तुल्य जीवन ही ऐसे लोगो की दुनिया हमेशा प्रशंसा करती है और याद भी रखती है।
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| Pic credit - Google/http://www.ajabgjab.com |
किसी समय में महर्षि दधीचि जो अपने बाल्य काल से ही परोपकारी एवं साहसी थे। एक बार एक पेड़ पर एक जहरीला साँप चढ़ गया। उस पेड़ पर एक तोते का परिवार रहता था साँप ने तोते के नन्हे से बच्चे को पकड़ लिया और बच्चा बचने के लिए तड़फड़ाने लगा। अपने बच्चे की मृत्यु नजदीक देख तोता और तोती बिलखने लगे। पेड़ के निचे तमाशबीनो की भीड़ जुट गयी, लेकिन किसी ने तोते के बच्चे को बचाने की हिम्मत नहीं दिखाई।
वही पास में दधीचि खेल रहे थे शोर - गुल सुन कर वे वह पहुंचे वश्तुस्थिति समझते ही वे पेड़ पर चढ़ गए। निचे खड़े लोग चिल्लाने लगे ..... दधीचि........निचे उतर जाओ साँप तुम्हे डस लेगा। यह सुन कर दधीचि बोले .......जीवन की रक्षा करना मनुष्य का धर्म है। मै तोते के परिवार को विपत्ति में पड़ा देख उससे मुँह नहीं मोड़ सकता। उन्होंने लकड़ी मार - मारकर सॉप के मुँह से बच्चे को छुड़ा लिया अपने बच्चे को जीवित देख तोता और तोती चहचहा उठे।
इससे पहले क्रोधित साँप उनपर हमला करता उन्होंने पेड़ से छलांग लगा दी उन्हें काफी चोटे आयी। लोगो ने उनसे पूछा .........दधीचि तुम्हे साँप से डर नहीं लगा यह सुन कर दधीचि ने उत्तर दिया .......डरना कैसा ......डरना है तो गलत काम करने से डरो।
अच्छा काम करने वालो की रक्षा तो स्वयं भगवान् करता है। दधीचि की यह लोक रक्षा की भावना आगे इतनी सशक्त हो गई की उन्होंने अपने शरीर की हड्डिया तक असुरता के नाश हेतु दान दे डाली। आज भी महर्षि दधीचि अपने इन्ही भावों के कारण विश्वविख्यात है। शायद ही कोई होगा जो इनके बारे में न जानता हो। परोपकार करना सबसे बड़ा धर्म का काम है इसके जैसा इससे बढ़िया कोई कर्म नहीं है। परोपकारी जीवन एक देव तुल्य जीवन ही ऐसे लोगो की दुनिया हमेशा प्रशंसा करती है और याद भी रखती है।

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